स्वर्ग से भी बढ़कर तू जननी की आदि काल से नित मातृ पूजन

स्वर्ग से भी बढ़कर तू जननी की आदि काल से नित मातृ पूजन


सत्येन्द्र कुमार शर्मा,

सोमवार 10 मई 2020 : ताम्र पाषाण युग में मातृ पूजन किया जाता रहा है तो द्वापर में भगवान कृष्ण ने दो मॉ एक जन्म देने वाली तो दूसरी पालन करने वाली को अपनी लिलाओं के माध्यम से नाम को अमीट बना दिया है।
त्रेता के राम ने तो शौतेली मॉ के वचनानुसार राज सिंहासन को त्यागकर वनवास अज्ञात वास के घोर कष्टों का वरण कर जीवन यापन कर दिखाया है।बागवान में दत्तक पुत्र ने भी एक मिशाल कायम कर दिखाया है।
आखिर इन कथा के रचनाकार ने हमें जो बताया हम आज उससे कोसों दूर भाग रहे हैं । जबकि मॉ के आशिर्वचनों से ही हमारा भरा पुरा जीवन यापन करने का मौका जो हांथ लगा है। मॉ के लिए बेटा हो या बेटी सबों के लिए ठंड का मौसम हो या गर्मी के मौसम की रात हो गीली चादर पर स्वंय सो कर सुखे चादर पर अपने संतान को सुलाने का पाठ जो हमें सिखलाई है।मॉ के इस पाठ ने एक गुरू होने का हक भी तो लिया है। मुझे मेरी मॉ का सानिध्य आज भी प्राप्त है।
“”माता के चुम्बन और पिता के दुलार से सिखता है बच्चा नागरिकता प्रथम पाठ”” यह महान विचारक मेजनी का कथन है।
किसी दूसरे की बजाय मैं 20 अप्रैल 1984 को परिणय सूत्र मेंं बंधा।परिणय सूत्र में बंधने पर अर्द्धागींणी के साथ ही अर्द्धागिणी की मॉ का सानिध्य प्राप्त हुआ जो अब नहीं रहीं। अब उन्हें सिर्फ याद करन ही मात्र शेष रह गया है।
खैर जो भी हो वंश परम्परा को बढ़ाने की एक नई भूमिका शुरू होती है। एक और मॉ के दुलार प्यार की शुरुआत होती है। उस मॉ के ही अलविदा ने जननी-जन्म भूमी के स्वर्ग से बढ़कर होने की कहानी को नया आयाम दिया है।
अब उनकी स्मृतियों को याद कर दंपती के भाव विह्वल होना ही एक मात्र मार्ग शेष रह गया है।
गौरतलब यह है कि ताम्रपाषाण युग में मातृ पूजन करने से संबंधित आलेख के माध्यम से मॉ की महिमा का बखान अभी हाल ही में किया गया है।जो बेहद विचारणीय है। भारतीय संस्कृति में मॉ की पूजन करने की विधि विधान है जिसमें अपनी मॉ के साथ अर्द्धागीनी की मॉ की पूजन शामिल हैं।
गौरतलब यह है कि श्रृष्टि के आदि काल की मॉ की पूजन करने की सील सीला आज भी कायम है जिसकी चर्चा मैने उपर ही कर दिया हूं। मॉ पार्वती, सरस्वती,लक्ष्मी, दुर्गा के अनेक रूपों की आराधना करने का विधान है।
मातृ दिवस पर विशेष कुछ कहने से पहले विचारों के गंगोत्री में डुबकी लगाने मात्र शेष है।
भारतीय संस्कृति से अलग के लोगों ने जब मॉ की महत्ता को समझे तो 10 मई को मदर्स डे को मनाने का शुभारंभ किया। ये दिन मां को प्यार और सम्मान जताने का दिन है।संसार की सभी माताओ को हार्दिक शुभकामनाये देने का दिन है।

हजारों फूल चाहिए एक माला बनाने के लिए।
हजारों दीपक चाहिए एक आरती सजाने के लिए।
हजारों बूंद चाहिए समुद्र बनाने के लिए।
पर “माँ ” अकेली ही काफी है_
बच्चों की जिंदगी को स्वर्ग बनाने के लिए।
महशुश करने को विवश है लेकिन उनके विचार में पूजन करना शामिल नहीं है।

वे कहते हैं ऐ मेरे मालिक
तूने गुल को गुलशन में जगह दी।
पानी को दरिया में जगह दी।
पंछियों को आसमान मे जगह दी।
तू उस शख्स को जन्नत में जगह दी।
लेकिन जिसने मुझे नौ महीने पेट में जगह दी। उनके पूजने की बात नहीं कही।
🙏🙏🙏🙏

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