मॉ में विराजमान आदि शक्ति मां सरस्वती की पूजा अनादि काल से

मॉ में विराजमान आदि शक्ति मां सरस्वती की पूजा अनादि काल से

सत्येन्द्र कुमार शर्मा

आदि शक्ति मॉ सरस्वती की पूजा अनादि काल से किया जा रहा हैं। लेकिन मॉ की पूजा अर्चना करने की पारंपरिक ज्ञान बांटने वाली अपनी मां में विराजमान सरस्वती रूप की पूजन अर्चन वंदन ज्ञान प्राप्ति के साथ अनादि काल से किया जाता रहा है।
मॉ के स्नेह प्यार दुलार और क्रोध घृणा मोह माया बर्बस कुछ अलग कहने को मजबूर कर दे रहा है।

“ॐ सरस्वती नमस्तुभ्यं वरदे कामरुपिणि।
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा।।”
मेरे बड़े भैया वाई.पी.ठाकुर के शब्दों में बयां किया गया है।

“या देवी सर्व भूतेषु बुद्धि रूपैण संस्थिताः ,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
ॐ श्री सरस्वतयै नमः।”

बुद्धि प्रदात्री, वाग्देवी माँ सरस्वती के आराधना पर्व “वसन्त पंचमी ” की आप सभी को हार्दिक बधाई और शुभकामनायें।
माँ सरस्वती की कृपा हम सब पर सदैव बनी रहे ।
अभीन्न मित्र मदन सिंह, मंटू सिंह द्वारा कहा गया है।

“ॐ सरस्वती नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणी।
स्वाध्यायं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा।।”
अवकाश प्राप्त बैंक कर्मी पंडित अमिताभ पाण्डेय द्वारा बताया गया।
मॉ में विराजमान सरस्वती रूप की पूजा भी अनादि काल से दैनिक पूजा में शामिल हैं। ज्ञान दात्री के साथ ही मॉ की भी पूजा करने की परंपरा रही है।

मॉ में विराजमान सरस्वती रूप की पूजा दैनिक रूप से की जाती हैं कहने में संकोच होने लगता हैं। लेकिन अध्यात्मिक चर्चाओं में दोनों हाथों के हथेलियों को देखने वाले लोगों के अनुसार हथेली के शीर्ष भाग में लक्ष्मी मध्य में सरस्वती एवं नीचले भाग में भगवान विष्णु के रूप में विराजमान होने की भी बात कही जाती है। नित्य सुबह जगने पर अपने हथेलियों का दर्शन कर दैनिक दिनचर्या शुरू करने की बात आमतौर पर अधिकांश लोगों द्वारा कही जाती है।
मॉ सरस्वती पूजा अर्चना पूजा मंडपों में तो सार्वजनिक रूप से किया जाता है। परन्तु अपने घर में सिर्फ मॉ में विराजमान सरस्वती लक्ष्मी पार्वती रूपों की पूजा करने की सार्वजनिक स्वीकृति रही है। मॉ के पूजन से स्व कल्याण की बंद राहें भी खुल जाती है।
बसंती बेला में मॉ सरस्वती की पूजा अर्चना वेद मन्त्रोंचार के साथ पंचमी के दिन किया जाता रहा हैं लेकिन मॉ के सरस्वती रूप की पूजा हमेशा किया जाता रहा है।
बसंत पंचमी का त्यौहार मानव जीवन में ज्ञान रूपी रंग गुलाल वैभव से परिपूर्ण होने की कामनाओं के लिए किया जाता रहा है।मॉ की पूजा एहसास कराने के लिए किया जाता रहा है।
बासंतिक रंगीन खुशियों का त्योहार बसंत पंचमी के अवसर पर एक दूसरे के परिवार की ओर से हार्दिक शुभकामनाओं के साथ उज्जवल भविष्य की मंगल कामना किया जाता रहा है।मॉ की पूजा हमेशा जीवनोत्सव के लिए किया जाता रहा है।
देश विदेश में रहने वाले तमाम लोगों के सरस्वती पूजा अर्चना के संवादों के आदान-प्रदान से सबों के दैनिक जीवन मेंं ज्ञान से परिपूर्ण बासंतिक रंग गुलाल से रंगीन खुशियों का त्योहार बसंत पंचमी की तरह उत्साह मस्ती से भरा पुरा हो जाता रहा है।मॉ की पूजा से ताउम्र बासंतिक जीवन रहता है।
मां सरस्वती से करबद्ध प्रार्थना किया जाता है कि सभी का जीवन सुख शांति, समृद्धि एवं खुशहाली से भरा पुरा हो।
इस श्रृष्टी के रचयिता भगवान ब्रह्मा जी की अर्द्धागींंनी
मॉ सरस्वती को बताया जाता है। ब्रह्माजी की अर्द्धागिंनी मॉ सरस्वती की पूजा अर्चना हम पारंपरिक अध्यात्मिक वैदिक मंत्रोच्चार के साथ करते हैं।
अर्थात आदि माता की पूजा अर्चना आदि काल से आज भी पारंपरिक रूप में किया जा रहा है। मॉ सरस्वती का ज्ञान देने वाली मां की पूजा भी आदि काल से अब तक किया जा रहा है।जिसकी प्रमाणिकता के रूप में कुछ लोगों के शब्दों का उल्लेख किया हूं लेकिन सैकड़ों लोगों ने इस सच्चाई को स्वीकार किया है।

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