संकट श्राद्धकर्म की पूजा का नहीं बड़ा संकट मॉ के पूजन की तैयारी का

संकट श्राद्धकर्म की पूजा का नहीं बड़ा संकट मॉ के पूजन की तैयारी का


सत्येन्द्र कुमार शर्मा,

आज से भारतीय संस्कृति में नव वर्ष का उल्लास एवं मॉ के पूजन से आरंभ किया जाता रहा है जो आज संकट के दौर से गुजर रहा है। किसी भी भारतीय के मॉ के निधन पर मॉ‌ के पार्थीव शरीर को शोकाकुल परिवार अग्नी को समर्पित कर उन्हें स्मरणार्थ पूजन करते हैं।
पूजन की इस विधि में एक से नव दिनों तक एक जैसा विधि विधान को सभी कबुलते है। दसवें दिन मुंडन का कार्यक्रम प्राय: हिन्दू समाज के लोगों द्वारा एक ही तरह से मनाया जाता रहा है।

गौरतलब यह है कि शक्ति के विभिन्न रूपों की पूजा अर्चना को हम नवरात्र के रूप में मनाते रहे हैं अब मंथन उसी प्रकार से जुड़े होने की वजह से कर्मकांड की प्रधानता रही होगी जिससे हम अलग होते गए हैं।
आज नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा अर्चना विभिन्न रूपों में हम करते हैं लेकिन अधिकांश लोग आज अपनी मॉ की पूजा अर्चना करने की बात ही दूर है।उन्से अलग हटकर सांसारिक सुखों में लिप्त मिल रहें हैं।
नोवेल कोरोना वायरस ने हिंदू सांस्कृतिक के उन नियमों को मानने के लिए आतुर कर दिया है। जैसे मृत्यु के दसवें दिन पुरूष बाल मुराए तो महिलाएं नाखुन कटाए विधि विधान का पालन करने को कोरोना ने मजबूर तो नहीं कर दिया है।
लेकिन राम के एक माह के अज्ञात वास,लक्ष्मण रेखा के उल्लघंन की परख परिणाम की ओर झांकने के लिए भारत के प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने भी कबुलते हुए अनिवार्य कर दिया है।
हालांकि अब तक अन्य विधियों को ताक पर रख दिया जाता रहा हैं जिसे सोंचन विचारने को एक बार फिर मजबूर कर दिया है।

अब आइए समझें हमारे पूर्वजों के समय की कुछ बातें और शर्तें जो हम भुलते जा रहे हैं।

शौचालय और स्नानघर निवास स्थान से दूर खुले में बाहर करने की परम्परा रही है।हांथ धोने के भी नियम रहे हैं तो मल मूत्र धोने के पात्र की सफाई के भी नियम रहे हैं जो शायद हम भुलते चले गए हैं।

हांथ एवं पात्र को तीन-तीन बार अलग-अलग मांजने धोने के साथ एक बार संयुक्त रूप से सफाई करने का नियम रहा है।
बाल कटवाने के बाद या किसी के दाह संस्कार से वापस घर आने पर बाहर ही स्नान करना होता था बिना किसी व्यक्ति या समान ब्यक्ति को हाथ लगाए या छुए।

पैरो की चप्पल या जूते घर के बाहर उतार दिया जाता रहा है। खास कर रसोई घर के अंदर ले जाना निषेध था।

घर के बाहर पानी रखा जाता था और कही से भी घर वापस आने पर हाथ पैर धोने के बाद अंदर प्रवेश किया जाता रहा है।

जन्म या मृत्यु के बाद घरवालों को 10 या 13 दिनों तक सामाजिक कार्यों से दूर रहना अनिवार्य रूप पालन करना होता था।

किसी घर में मृत्यु होने पर उस घर के साथ निकटवर्ती परिजनों के घर भी भोजन नहीं बनता था ।

मृत व्यक्ति के और दाह संस्कार करने वाले व्यक्ति के वस्त्र को शमशान में त्याग देना पड़ता था।

भोजन बनाने से पहले स्नान करना जरूरी तथा उस गीले कपड़ा पहने खाना बनाया जाता रहा है ।

स्नान के पश्चात किसी अशुद्ध वस्तु या व्यक्ति के संपर्क से बचा जाता रहा है।

प्रातःकाल स्नान कर घर में अगरबत्ती,कपूर,धूप एवं घंटी और शंख बजा कर पूजा की जाती थी।

हमने अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित नियमों को ढ़कोसला समझ छोड़ दिया और पश्चिम के नियमों को अंधा अनुसरण करने लगे।

आज कॉरोना वायरस ने हमें फिर से अपने संस्कारों की याद दिला दी है,उनका महत्व बता दिया है।
हिन्दू धर्म, ज्ञान और परंपरा हमेशा से समृद्ध रहा है।

आज वक्त है अपनी आंखो पर पड़ी धूल झाड़ने और ये उच्च संस्कार अपने परिवार और बच्चो को देने का।
विषय गंभीर है । कोरोना को जो नही समझ पा रहे या मजाक समझ रहे हैं वो केवल 5 बातों पर ध्यान दे कर देखें :-
पहला अब तक कितनी बार सरकार द्वारा आपकी कॉलर ट्यून बदली गई है। आज तक कितनी बार दो देशों की सीमाओं को पूर्णतः प्रतिबंधित किया गया है ।
कितनी बार विद्यालयों की परीक्षा रद्द की गई या मॉल , सिनेमाघर इत्यादि बन्द रहे हैं । कितनी बार न्यायालय या अन्य कार्यालय बन्द होते दिखे है। कितनी बार सरकार ने किसी वायरस के चलते धारा 144 कर्फ्यू लगाई है।
समस्या यह है कि सरकार जनता को पूरी बात इसलिए नही बता रही कि कहीं जनता घबराए ना । लेकिन चेतावनी लगातार दे रही है और पूरे प्रयास कर रही है कि जनता सुरक्षित रहे। लेकिन जनता को मजाक से फुरसत नही है । जिन्हें अभी भी समझ नही आ रहा वो गूगल पर इटली ओर चीन की स्थिति देखें

जनता कर्फ़्यू के पीछे का लॉजिक ।
चूंकि एक स्थान पर कारोना वायरस का जीवन 12 घंटे और जनता कर्फ्यू 14 घंटे के लिए होता है, इसलिए सार्वजनिक क्षेत्रों के स्थान या बिंदु जहां कारोना बच सकता है, उसे 14 घंटे तक नहीं छुआ जाएगा और इससे श्रृंखला टूट जाएगी।
14 घंटे के बाद हमें जो मिलेगा वह एक सुरक्षित देश होगा। वह विचार है पीछे। आगे यह एक ड्रिल होगा यदि निकट भविष्य में अधिक समय तक आवश्यकता होगी।

ये सप्ताह कैरोना के लिए बेहद वाइटल माना जा रहा है।
इसे कम्यूनिटी स्टेज कहते हैं। और इस समय रुक गया तो ठीक… नहीं तो महामारी स्टेज में चला जाएगा इसके पहले सरकार ने 21 दिनों का लक्ष्मण रेखा खिंची है । अब हमें उसका पालन करना शेष है।फिर हम सब इसकी ज़द से बाहर हो जाएंगे।

इटली में इसे लोगों ने शुरू में हल्के से लिया। छूट्टी समझ कर पार्टी करते रहे, दोस्तों रिश्तेदारों से मिलते रहे जिससे ये कम्युनिटी में फैल कर अब महामारी बन गया है।कौन किसमें फैला रहा है, सरकार पकड़ ही नही पा रही ।
भय, अवसाद, अनिद्रा, अकेलापन…आज इटली का यथार्थ है। जिससे निकलने में वर्षो लग जाएंगे।

आपकी ज़िंदगी आपके माँ बाप, भाई- बहन, मित्रों के लिए बेहद मायने रखता है। आप पर न जाने कितने लोगों की जिम्मेवारियां हैं। इसलिए जिम्मेवार बनिये। इसे हल्के में मत लीजिए और जितना हो सके, अकेले में समय बिताइए। अच्छी किताबें पढ़िए, मोबाइल को चलाइये, मूवी डाऊनलोड करके देखिए। पर प्लीज़ अकेले रहिये।

आपकी लापरवाही और मज़ाक आप पर, आपके अपनों पर बहुत भारी न पड़ जाए।

अज्ञात वास और लक्ष्मण रेखा उल्लंघन करने कराने वाले लोगों को सोने की लंका गवां देनी पड़ी है।

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मुख्य संपादक: विकाश कुमार राय

“अपना परिचय देना, सिर्फ अपना नाम बताने तक सीमित नहीं रहता; ये अपनी बातों को शेयर करके और अक्सर फिजिकल कांटैक्ट के जरिये किसी नए इंसान के साथ जुड़ने का तरीका है। किसी अजनबी इंसान के सामने अपना परिचय देना काफी कठिन हो सकता है, क्योंकि आप उस वक़्त पर जो भी कुछ बोलते हैं, वो उस वक़्त की जरूरत पर निर्भर करता है।”

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