रसोई से भोजन के सफर में आप कहां

रसोई से भोजन के सफर में आप कहां


सत्येन्द्र कुमार शर्मा

रसोई ,रसोईघर, भंडारा ,यज्ञ मेंं लगातार बदलाव अब शोध का विषय बनता जा रहा है। ग्रामीण घरों के रसोई,रसोईघर, भंडारा,यज्ञ में बदलाव की व्यापकता दिशा विचारणीय होता जा रहा है। ग्रामीण हल्का में तुलसी दल आज भी रसोई घर के रसोई मेंं कायम हैं कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है।

लेकिन रसोई में वर्जित लहसुन प्याज उसमें शामिल होता जा रहा है।तो दूसरी ओर तुलसी दल रसोई घर से बाहर निकलता जा रहा हैं कहने में आम लोग हिचकिचाहट महसूस करने को मजबूर हो जा रहे हैं।

बहरहाल कथाओं में जब सम्राट अशोक की पत्नी सुदक्षिणा ने रसोइया को सब्जी में प्याज डालने के लिए कहा तो अशोक ने यह कहकर मना कर दिया। देवी “अहं क्षत्रीयं कथं पाण्डुलं भक्ष्यामि” । क्षत्रीय होकर प्याज कैसे खाया जा सकता है। यह तब की बात है जब अहिंसा परमो धर्मः की भावना चरम पर थी ।
वहीं लहसून और प्याज की उत्पति के संबंध में कहते हैं कि एक राक्षस के गले को काटने से निकले रक्त से हुई थी ।

उधर लहसून को आयुर्वेद में रसोन कहा गया है । रसों से भरा हो उसे रसोन कहते हैं । जो कई रसों को पैदा करे उसे रसोन कहते हैं ।
अमृत को भी रसोन कहा जाता हैं जो आज भी दुर्लभ है। लहसून और प्याज दोनों अस्वाभाविक काम को पैदा करते हैं और दोनों दुर्गन्ध एवं त्वरित सडन पैदा करते हैं । इसलिए हमारे पूर्वजों ने इसे रसोई घर में जाने से वर्जित किया था । प्याज मुख्यतः मांसाहार में प्रयोग होता है । मुझे किसी के आहार में कुछ भी लेने से कोई आपत्ति नहीं है किंतु तुलसी दल उस सब्जी में नहीं डालना चाहिए जिसमें प्याज लहसून का प्रयोग हुआ है । तुलसी दल डालते ही भगवान् विष्णु को भोग लग जाता है और प्याज लहसून का भोग भगवान विष्णु को वर्जित है । यज्ञ मेंं भी प्याज वर्जित है । गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि” यज्ञ मैं ही हूं “। भोगवाद ने हमारे रसोई घर को इतना प्रभावित किया कि प्रसाद अथवा भोजन की जगह खाना बनने लगा । कभी रसोई घर में चप्पल जूता वर्जित थे । बिना स्नान किए रसोई घर में प्रवेश वर्जित रहा है । रसोई घर की जगह अब आज किचेन रुम बनते ही उस किचेन रूम में चिकेन का प्रवेश हो जाना आमबात है। सुबह शाम वन्दना के बाद ही प्रसाद पाने की परंपरा रही है। भोजन जमीन पर बैठकर पंगत में होता रहा है । बदलाव में पहले भात बनता था अब चावल बनता है । भात रोटी को कच्चा रसोई तथा पुरी को पक्का रसोई कहा जाता रहा है । भात भाई के लिए होता था और भाई ही भात बनातें रहे हैं। अब चावल सबके घर हलुआई ही बनाते है। हलुआई कहता है बिना प्याज की सब्जी नहीं बनेंगी। जितना बड़ा भोज उतना ही बोरा प्याज की जरूरत है। देवता साधु ब्राम्हण बैठकर उसके गंध का पान करते हैं । पंगत मिट गए एवं खडा होकर बफर के नाम पर बिना पानी खाने की होड़ लग गई है। संस्कृति की रक्षा करने के भाषण देने वालों ने ही संस्कृति को रौंदना शुरू कर दिया है। ऐसे में लगता है हम कलकता की गाड़ी में बैठकर नागपुर जाने का प्रयत्न ही कर रहे हैं । जब हमारा भोजन ही शुद्ध नहीं रहा तो हमारा मन शुद्ध रहेगा इसकी सम्भावना दूर दूर तक दिखाई नहींं पड़ रहा है । जैसा हो अन्न वैसा हो मन कहा गया है वाक्यांश विचारणीय होता जा रहा है।

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